लखनऊ की रातों में एक अजीब सा जादू होता है। दिन भर की भागदौड़ के बाद जब शहर की रफ्तार धीमी पड़ने लगती है, जब सड़कों पर रोशनी फैल जाती है और हवा में ठंडक उतरने लगती है, तब यह शहर जैसे अपनी असली कहानी सुनाना शुरू करता है। कहते हैं कि लखनऊ में कुछ बातें दिन की भीड़ में नहीं कही जातीं, वे रात के सुकून में दिल तक पहुँचती हैं। और शायद प्रेम भी उन्हीं बातों में से एक है।
मीरा को रातें हमेशा से पसंद थीं। दिनभर वह एक प्रकाशन संस्थान में काम करती, लोगों की लिखी कहानियों को पढ़ती और उन्हें बेहतर बनाती। लेकिन अपनी कहानी लिखने से वह हमेशा बचती रही। उसे लगता था कि प्रेम सिर्फ किताबों में अच्छा लगता है। असल ज़िंदगी में लोग वादे करते हैं और फिर समय के साथ बदल जाते हैं। इसलिए उसने अपने दिल के चारों ओर एक अदृश्य दूरी बना ली थी।
उस रात ऑफिस से लौटते हुए उसका मन सीधे घर जाने का नहीं हुआ। मौसम सुहाना था। हवा में हल्की ठंड थी और शहर की रोशनी उसे बाहर रुकने का बहाना दे रही थी। वह एक पुराने कैफे में चली गई, जहाँ वह कभी-कभी अकेले बैठने आया करती थी। उसने चाय मंगवाई और खिड़की के पास बैठ गई। बाहर लोगों को आते-जाते देखना उसे अच्छा लगता था।
कुछ देर बाद किसी ने धीमे से पूछा—“अगर मैं यहाँ बैठूँ तो आपको परेशानी होगी?”
मीरा ने ऊपर देखा। सामने एक लड़का था। चेहरे पर सुकून, हाथ में एक किताब और आँखों में एक सहज मुस्कान।
मीरा ने कहा—“नहीं, बैठ जाइए।”
वह बैठ गया। कुछ मिनट दोनों चुप रहे। फिर उसने पूछा—“आप लोगों को देख रही हैं या कुछ सोच रही हैं?”
मीरा मुस्कुरा दी—“दोनों।”
वह हल्का हँसा—“अच्छा है… क्योंकि कहानियाँ ऐसे ही मिलती हैं।”
उसने अपना नाम बताया—विहान।
विहान शहर में नया था और एक आर्किटेक्ट था। उसे पुराने शहरों की बनावट और उनकी कहानियाँ पसंद थीं। बातचीत शुरू हुई और धीरे-धीरे लंबी होती गई। पहले काम, फिर शहर, फिर पसंदीदा मौसम और फिर उन बातों तक जो लोग अक्सर किसी अजनबी से नहीं करते।
जाते समय विहान ने कहा—“अगर फिर मिले तो अगली चाय मेरी तरफ से।”
मीरा मुस्कुरा दी और चली गई।
लेकिन अगले दिन जब वह उसी समय वहाँ पहुँची, तो विहान पहले से बैठा था। सामने दो कप रखे थे।
उसने कहा—“मैंने सोचा शायद आप आएँगी।”
मीरा हँस पड़ी और बैठ गई।
धीरे-धीरे उनकी मुलाकातें बढ़ने लगीं। अब शामें और रातें बातों में बीतने लगीं। कभी चाय, कभी लंबी सैर, कभी सिर्फ खामोशी। विहान की सबसे अलग बात यह थी कि वह सुनता बहुत था। वह छोटी-छोटी बातें याद रखता था—मीरा को हल्की मीठी चाय पसंद है, उसे रात में चलना अच्छा लगता है और वह किसी बात को महसूस करते हुए थोड़ी देर चुप हो जाती है।
एक रात दोनों शहर की शांत सड़क पर टहल रहे थे। हवा ठंडी थी। दूर हल्की रोशनी दिख रही थी।
विहान ने पूछा—“तुम प्यार पर भरोसा क्यों नहीं करती?”
मीरा कुछ देर चुप रही। फिर बोली—
“क्योंकि लोग शुरुआत में बहुत अच्छे लगते हैं और बाद में बदल जाते हैं।”
विहान ने धीरे से कहा—
“और अगर कोई बदलने न आए… सिर्फ साथ चलने आए?”
मीरा ने उसकी तरफ देखा।
उसके पास जवाब नहीं था।
लेकिन उस रात कुछ बदल गया।
अब उसे इंतज़ार होने लगा था।
अगर एक दिन मुलाकात न हो तो रात अधूरी लगती।
अगर कोई बात अधूरी रह जाए तो नींद नहीं आती।
कुछ हफ्तों बाद विहान को दूसरे शहर जाना पड़ा। एक बड़ा प्रोजेक्ट मिला था।
जाने वाली रात दोनों उसी कैफे में मिले।
आज चाय जल्दी खत्म हो गई।
बातें कम थीं।
विहान ने पूछा—
“अगर मैं चला गया तो?”
मीरा ने बाहर रात को देखा।
फिर मुस्कुराकर बोली—
“कुछ लोग रात जैसे होते हैं।”
विहान ने पूछा—
“मतलब?”
वह बोली—
“दिन बदलते रहते हैं… लेकिन रात फिर लौट आती है।”
विहान कुछ देर उसे देखता रहा।
फिर मुस्कुरा दिया।
वह चला गया।
समय बीतता रहा।
लेकिन एक रात—
मीरा फिर उसी कैफे में बैठी थी।
उसने चाय उठाई ही थी कि सामने एक और कप रख दिया गया।
वही आवाज़—
“आज भी हल्की मीठी?”
मीरा ने ऊपर देखा।
विहान वापस आ गया था।
उसने पूछा—
“लौट आए?”
विहान मुस्कुराया—
“कुछ शहर और कुछ लोग सिर्फ याद करने के लिए नहीं होते।”
मीरा ने कुछ नहीं कहा।
बस मुस्कुरा दी।
उस रात उसे समझ आया—
प्रेम हमेशा बड़े इज़हारों में नहीं होता।
कभी-कभी वह एक लौट आने में होता है।
एक इंतज़ार में होता है।
वह हमेशा थोड़ा और खूबसूरत लगने लगता है।
यही थी—
लखनऊ की प्रेम भरी रात।